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अध्यापक की व्यकितत्व निर्माण में भूमिकारू षिक्षा का लक्ष्य व्यकितत्व का सर्वागींण विकास करना है। अतरू षिक्षा मनोविज्ञान में अध्यापक प्रमुख व्यकित है जो बालक के व्यकितत्व के निर्माण में सहायता प्रदान करता है। अध्यापक बालकों में उनकी आवष्यकताओं व कमियों के अनुसार परिवर्तन लाने की सोचता है। जिससे कि प्रत्येक बालक एक निषिचत तथा उचित ढंग से कार्य कर सके और अपने भीतर उसी प्रकार के परिवर्तन उत्पन्न कर सके। अध्यापक का स्वंय का व्यकितत्व बालक के व्यवहार पर बहुत अधिक प्रभाव डालता है। यदि अध्यपाकों में भय, प्रसन्नता व संवेगात्मक असिथरता है, तो बालकों पर इतना गहरा प्रभाव पडता है, कि उन में अध्यापक से अधिक संवेगात्मक लक्षण देखने को मिलते है। अध्यापक के स्वयं के उचित समाजिक और व्यकितगत व्यवहारों का प्रभाव उसके विधार्थियों पर अवष्य ही अच्छा पड़ेगा।ष्
व्यकितत्व के विकास में विकास के विभिन्न कारकों के योगदान की व्याख्या करते हुए अध्यापक अपनी भूमिका का प्रभावी उपयोग षिक्षा मनोविज्ञान के ज्ञान के पश्चात कुषलतापूर्वक करता है। एक अच्छे व्यकितत्व को बालक के समाज में समायोजन व अनुषीलन की योग्यता के सन्दर्भ में देखा जाता है। अध्यापक का लक्ष्य है बालक के व्यकितत्व का विकास करना है जो कि व्यकित का अपने वातावरण के साथ अपूर्ण और स्थायी समायोजन है।

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